- उज्जैन के छात्र की कनाडा में मौत: CM मोहन यादव परिवार से मिले, अंतिम संस्कार तक हर मदद का भरोसा
- उज्जैन में विक्रम विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह, राज्यपाल और CM ने मेधावी छात्रों को किया सम्मानित
- महाकाल मंदिर में तड़के भस्म आरती: रजत चंद्र, त्रिशूल और त्रिपुंड से राजा स्वरूप में सजे बाबा, गूंजी जयकार!
- टीम इंडिया के स्टार ऑलराउंडर तिलक वर्मा ने किए बाबा महाकाल के दर्शन, चांदी द्वार से किया जलाभिषेक
- विक्रम विश्वविद्यालय का 30वां दीक्षांत समारोह 17 मार्च को, राज्यपाल और मुख्यमंत्री करेंगे शिरकत
44/84 श्री उत्तरेश्वर महादेव
44/84 श्री उत्तरेश्वर महादेव
पहले इंद्र राजा ने मेघो को वृष्टि करने के लिए नियमानुसार आदेश से नियमानुसार वर्षा होती थी। कुछ समय तक मेघों ने अपनी इच्छानुसार वर्षा करना शुरू कर दिया जिससे पृथ्वी जलमग्न होने लगी। यज्ञ और हवन तक बंद हो गए जिसको देखकर ऋषि मुनि भयभीत होने लगे। इसकी शिकायत ऋषि मुनियों एवं देवगुरू ने ब्रम्हा से की। ऋषियों की परेशानी को सुनकर देवगुरू ने इंद्र को बुलाया। इंद्र ने देवगुरू से आज्ञा मांगते हुए पूछा महाप्रभु मेरे लिए क्या आदेश है। देवगुरू ने पृथ्वी के जलमग्न होने की घटना देवेन्द्र को बताई। इस पर देवेन्द्र ने मेघो के राजा को बुलया समझाया। कुछ दिनों तक मेघ नियमानुसार बरसने लगे ओर बीच में अचानक से प्रलयनुमा वर्षा करने लगे। जिससे पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। यह देखकर देवेन्द्र भगवान शिव की शरण में गए। मेघो के इस व्यवहार की बात बताई। भगवान शिव ने उत्तर के मेघो को बुलाया जिसके पास एक करोड़ मेघ थे। मेघ ने शिव से आज्ञा मांगी। भगवान ने कहा तुम महाकाल वन में भगवान गंगेश्वर की आराधना करो जिससे तुम्हारा क्रोध कम होगा ओर तुम्हे अधिक वर्षा करने की आवश्यकता भी नही होगी। शिव आराधना करने से प्रसन्न होकर प्रकट हुये तथा मेघ को वरदान दिया कि पृथ्वी पर उत्तरेष्वर नाम से प्रसिद्धि होगी और महाकाल वन में स्थित लिंग उत्तरेष्वर के नाम से विख्यात होगा।