- उज्जैन में दहेज प्रथा के खिलाफ मिसाल: दूल्हे ने लौटाए 50 लाख के कैश और सोना, सिर्फ अंगूठी ली
- महाकाल मंदिर में भस्म आरती: वीरभद्र जी से आज्ञा लेकर खुले चांदी द्वार, बाबा का हुआ पंचामृत अभिषेक
- सिंहस्थ के लिए पुलिस को तैयार कर रहा प्रशासन: उज्जैन में पुलिस अफसरों की 21 दिन की खास ट्रेनिंग शुरू, 41 विषयों पर रहेगा फोकस; 117 अधिकारी बनेंगे “मास्टर ट्रेनर”
- उज्जैन में भस्म आरती में शामिल हुए बिहार के पूर्व डिप्टी CM विजय सिन्हा: नंदी हॉल में बैठकर किए दर्शन, महाकाल से मांगा आशीर्वाद
- महाकाल मंदिर में भस्म आरती: त्रिपुण्ड, त्रिशूल और डमरू से सजे बाबा, गूंजी ‘जय श्री महाकाल’
वल्र्ड बुक डे आज: पुस्तकों से दूर हो रही युवा पीढ़ी, मोबाइल-कम्प्यूटर सबसे बड़ा कारण
Ujjain News: कम रही लाइब्रेरी, उपन्यास और कार्टून मैगजीन के शौकीन हुए कम
उज्जैन. युवा पीढ़ी लगातार पुस्तकों से दूर होती जा रही है। इसके पीछे कम्प्यूटर और मोबाइल सबसे बड़ा कारण माने जा रहे। वहीं कोर्स की किताबों का बोझ बढऩे के चलते भी बच्चों का अन्य पाठ्य सामग्री की तरफ ध्यान ही नहीं जाता। 5 मार्च को वल्र्ड बुक डे है। इस मौके पर पत्रिका ने शहर के युवाओं से चर्चा की।
स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई करने वाले बच्चों की नजर सीधे तौर पर मोबाइल स्क्रीन पर होती है। आम लोग भी वर्तमान की दौड़भाग वाली जिंदगी में किताबों से दूर होते जा रहे हैं। एक जमाना था, जब लाइब्रेरियों में पाठकों की भीड़ जुटा करती थी, वहीं कई लोग तो इसके स्थाई सदस्य भी होते थे। धीरे-धीरे लाइब्रेरियों में भी पाठकों की संख्या कम होती जा रही है। इसी प्रकार शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी बच्चों के लिए कॉर्टून वाली किताबों की दुकानें मिल जाया करती थीं। महिलाएं भी समाचार पत्र और उनके साथ आने वाली साप्ताहिक सप्लीमेंट को ही पढ़ती हैं।
सफर के दौरान ही पढ़ते हैं मैग्जीन
कार्तिक चौक निवासी राजेश व्यास का कहना है कि वे जब भी शहर से कहीं बाहर जाते हैं तो टाइम पास के लिए अच्छी सी मैग्जीन खरीदते हैं। इसके अलावा वे पुस्तकों से काफी लगाव रखते हैं। घर पर आज भी उपन्यास और सामान्य ज्ञान की पुस्तकों को पढ़ते हैं।
नेट पर ही मौजूद है सारी डिटेल
आज के दौर में पुस्तक पढऩे का समय किसी के पास नहीं। हम हमारे काम का डेटा नेट से ही ले लेते हैं। क्योंकि नेट पर हर टॉपिक और डिटेल आसानी से मिल जाती है। हां एक समय था, जब मैं कॉमिक्स खूब पढ़ा करती थी, लेकिन अब कोर्स की किताबें ही इतनी हैं, कि अन्य पुस्तकों को पढ़ नहीं पाती।- मेघा श्रीवास्तव