- गंगा दशहरा पर महाकाल मंदिर में शुरू हुई 16 घंटे की अखंड नृत्य आराधना, शयन आरती तक कलाकार देंगे नृत्यांजलि
- महाकाल मंदिर का नंदी हॉल बदलेगा रूप, 20 लाख की लागत से होगा सौंदर्यीकरण; सावन से पहले पूरा करने की तैयारी
- महाकाल मंदिर में भस्म आरती के नाम पर फिर ठगी, गुजरात की दो महिलाओं से 42 हजार रुपए वसूले; पुलिस ने शुरू की जांच
- शनिचरी अमावस्या पर उज्जैन के शनि मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब, 24 घंटे में 1000 लीटर से ज्यादा तेल चढ़ा; घाटों से हटाए गए कपड़े और जूते-चप्पल
- “मैं पापा के साथ जाऊंगा…”: उज्जैन कोर्ट में मासूम की जिद के बाद पिता संग भैरवगढ़ जेल पहुंचा 4 साल का बच्चा
66/84 श्री जल्पेश्वर महादेव
66/84 श्री जल्पेश्वर महादेव
सालों पहले जल्प नाम का राजा हुआ। वह तेजस्वी था। उसके पांच पुत्र सुबाहु, शत्रुमहि, जय, विजय ओर विक्रांत थे। राजा ने पूर्व दिशा का राज्य सुबाहू, दक्षिण का शत्रुमहि, पश्चिम दिशा का जय ओर उत्तर दिशा का विजय ओर मध्य का विक्रांत को दिया ओर खुद तपस्या करने चला गया। इधर विक्रांत ने मंत्री के कहने पर चारों भाईयो के राज्य पर अधिकार कर लिया ओर सभी का वध कर दिया। यह बात राजा को पता चली तो वह शोक जताने लगा। राजा ने वन में ही वशिष्ठ मुनि से बात कही ओर कहा कि युद्ध में ब्रम्हणों की हत्या हुई है। उसके पुत्रों की हत्या हुई इसका पाप उसे मिलेगा। उसने मुनि से पाप कर्मो से मुक्त होने का उपाय पूछा। मुनि ने कहा कि राजन आप महाकाल वन में कुक्कुटेश्वर महोदव के पश्चिम में स्थित शिवलिंग का पूजन करें। उसका पूजन कर परशुराम भी पाप मुक्त हुए थे। राजा मुनि की आज्ञा से महाकाल वन में आया ओर शिवलिंग का पूजन किया। भगवान शंकर प्रसन्न हुए ओर आकाशवाणी हुई कि राजा तुम निष्पाप हो। जो हुआ वह भाग्य के कारण हुआ। तुम वरदान मांगो। राजा ने कहा कि मुझे जन्मो के बंधन से मुक्ति मिले ओर मेरी ख्याति रहे। वरदान के कारण शिवलिंग जल्पेश्वर महोदव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य जल्पेश्वर महादेव का दर्शन पूजन करता है उसे धन ओर पुत्र का वियोग नहीं होता है।