- संत रविदास जयंती पर उज्जैन में एक साथ जुटे संत और समाज, 2121 दीपकों की रोशनी में जगमगाया शिप्रा तट
- महाकाल मंदिर पहुंचीं महिला कांग्रेस अध्यक्ष अल्का लांबा, मीडिया से बोलीं महिला कांग्रेस अध्यक्ष— नाम में भगवान जोड़ना काफी नहीं, सवाल ये है कि काम क्या किया जा रहा है
- उज्जैन में शिप्रा आरती को मिलेगा नया स्वरूप, रामघाट को वैश्विक पहचान देने की तैयारी; रोज होने वाली शिप्रा आरती बनेगी धार्मिक पर्यटन का केंद्र
- सुबह की पहली घंटी के साथ खुले महाकाल के पट, भस्म आरती में दिखा राजा स्वरूप
- महाकाल दरबार में भस्म आरती की अलौकिक छटा: सभा मंडप से गर्भगृह तक विधिविधान के साथ संपन्न हुई आराधना, बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने किए दर्शन
न मकान मालिक दे रहे ध्यान और न ही ठेकेदारों को इनकी चिंता
जिनकी मेहनत से तराशे जाते है मकान…वे तड़प रहे भूख से…
जिनके हाथों के हुनर से भवन, मकान और मल्टियां तराशी जाती है, वे ही श्रमिक और उनके परिजन भूख से तडफ़ रहे है…। मानवीयता को झकझोरने वाले ऐसे ही कुछ दृश्य अक्षरविश्व के मुकेश पांचाल और आशीष मिश्रा ने कैमरे में कैद किए है, परंतु ऐसे गरीब लोगों के हृदय और मन पर चोंट न पहुंचे।
लिहाजा मानवीयता पर आघात न करने की दृष्टि से अक्षरविश्व न तो फोटो ही प्रकाशित करना उचित समझता है और न ही नामों का प्रकाशन।
बावजूद इसके हम उन संस्थाओं से भी आग्रह करना चाहते है, जो लॉकडाउन की स्थिति में भूखों को भोजन के पैकेट्स उपलब्ध कराने का काम कर रही है, क्योंकि ऐसी संस्थाओं का ध्यान ही श्रमिक वर्ग पर नहीं है जो कॉलोनियों, मोहल्लों व गलियों में मकान बनाने के लिए वहीं टॉपरी बनाकर रह रहे है।
शहर की ऐसी कई कॉलोनियां व मोहल्ले आदि है, जहां मकान, भवन आदि बनाने का काम किया जा रहा है, लेकिन लॉकडाउन के कारण काम बंद हो गया है और ऐसी स्थिति में इन संबंधित स्थानों पर ईंट और पतरों से घरोंदा बनाकर रहने वाले श्रमिक तथा परिजनों के आगे पेट भरने के लाले पड़ गए है। कुछ एक स्थानों पर आस-पास रहने वाले लोग मदद के लिए हाथ आगे बढ़ा रहे है, फिर भी ऐसे मकान मालिक या ठेकेदार भी गुनाहगार माने जा सकते है, जिनके लिए ये श्रमिक काम में जुटे रहते थे। ऐसे ही कुछ श्रमिकों की यदि माने तो न तो ठेकेदार ही सुध ले रहे है और न ही मकान मालिकों को इस बात की चिंता है कि वे भूखे ही रह रहे है।
जबकि ठेकेदारों व मकान मालिकों का भी कर्तव्य बनता है कि वे अपनी ओर से श्रमिकों के लिए हर दिन भोजन की व्यवस्था करें। रही बात सामाजिक संस्थाओं की, जो ऐसे श्रमिकों तक पहुंच नहीं सकी है क्योंकि वे ठेकेदार या मकान मालिकों पर भरोसा कर रहे होंगे।
चावल का मांड पीकर मिटाई भूख
एक ऐसे श्रमिक की पीड़ा सुनकर अक्षरविश्व की टीम का भी मन भर आया जब उसने बताया कि तीन दिनों से उसे व उसके परिवार को कुछ खाने का नहीं मिला। जितना आटा दाल था, वह खत्म हो गया, पैसे तक नहीं है कि बाजार से जाकर खरीद लिया जाए। उसने बताया कि क्षेत्र के एक व्यक्ति ने चावल दे दिए थे, दाल तो नहीं थी, इसलिए गर्म पानी में चावल को पकाकर उसका ही मांड पीकर हमने अपनी भूख मिटाई।
इसके अलावा एक अन्य श्रमिक ने बताया कि उसके माता पिता मिलने के लिए आए थे परंतु लॉकडाउन शुरु होने के कारण वे अपने गांव जा नहीं जा सके और अब स्थिति यह है कि न वे अपना पेट भर पा रहे है और न माता पिता का ही। कुल मिलाकर पूरा परिवार भूखे ही रह रहा है।