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हरियाली अमावस्या पर श्रद्धा और प्रकृति का संगम, उज्जैन में उमड़ा आस्था का सैलाब; शिप्रा घाटों पर सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
हरियाली अमावस्या का पर्व इस बार उज्जैन में श्रद्धा, परंपरा और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ मनाया गया। गुरुवार सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ शिप्रा नदी के घाटों पर उमड़ पड़ी। भक्तों ने स्नान कर पवित्र जल से आत्मशुद्धि की, फिर मंदिरों में देव दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया। दूधतलाई, गऊघाट और अनंत पेठ जैसे प्रमुख स्थानों पर भक्तों की भारी चहल-पहल रही।
इस पावन दिन को पुनर्वसु नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे शुभ संयोगों ने और भी खास बना दिया। ज्योतिषाचार्य पंडित अमर डब्बावाला के अनुसार, हरियाली अमावस्या ‘दर्श अमावस्या’ की श्रेणी में आती है। इस दिन पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान और दान की परंपरा निभाई जाती है। वहीं दूसरी ओर, यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है।
सुबह दूधतलाई स्थित दूधेश्वर महादेव मंदिर में पंचामृत से अभिषेक कर भगवान शिव का भव्य श्रृंगार किया गया। मंदिरों की घंटियों और शिव स्तुति के साथ श्रद्धालु भक्ति में लीन दिखाई दिए। शाम होते-होते मंदिर परिसर और अनंत पेठ क्षेत्र में पारंपरिक मेलों का आयोजन शुरू हो गया। चकरी, झूले और मिठाइयों की दुकानों से बच्चों की खुशी देखते ही बनती थी।
हरियाली अमावस्या पर उज्जैन में एक और खास परंपरा निभाई जाती है — धानी मुक्का। यह एक रोचक लोक परंपरा है जिसमें व्रत रखने वाली युवतियां अपनी सहेलियों के साथ मिलकर धानी मुक्का खेलती हैं। यह अनुष्ठान न सिर्फ सामाजिक जुड़ाव का माध्यम है, बल्कि रीति-रिवाजों से जुड़ी हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखता है।
हरियाली अमावस्या केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, यह प्रकृति की आराधना का दिन भी है। पेड़-पौधे लगाना, उनकी सेवा करना और उन्हें पर्यावरण संतुलन के वाहक के रूप में देखना — यही इस दिन का संदेश है। यही कारण है कि उज्जैन के घाटों, मंदिरों और धर्मशालाओं में लोगों ने बड़े उत्साह से पौधारोपण किया और पर्यावरण रक्षा का संकल्प लिया।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, हर पौधे का अपना विशेष महत्व होता है। तुलसी, आंवला और बेल जैसे पौधे लक्ष्मी प्राप्ति से जुड़े माने जाते हैं, तो पीपल, नीम और नागकेशर जैसी वनस्पतियां संतान प्राप्ति और आरोग्य के लिए शुभ मानी जाती हैं। वहीं मोगरा, गुलाब और हरसिंगार जैसे पुष्प पौधों को सुख और आनंद का प्रतीक माना गया है।
उज्जैन में हरियाली अमावस्या का यह उत्सव न केवल आस्था और परंपरा का उत्सव था, बल्कि एक संदेश भी — कि प्रकृति हमारी पूजनीय है, और उसका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी। पौधे लगाकर, पितरों का तर्पण कर और सामाजिक मेलों में भाग लेकर लोगों ने इस पर्व को सार्थकता दी।