- महाशिवरात्रि से पहले महाकाल दरबार में अंतरराष्ट्रीय पुष्प सज्जा की शुरुआत: 40 से अधिक विदेशी फूलों से सजेगा परिसर; बेंगलुरु से आए 200+ कलाकार तैयारियों में जुटे
- उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में तड़के विशेष पूजा-विधि: स्वस्ति वाचन के साथ खुले पट, राजा स्वरूप में सजा दरबार
- महाशिवरात्रि से पहले उज्जैन में हाई अलर्ट: देवास गेट से रेलवे स्टेशन तक संयुक्त सर्च ऑपरेशन, 100 पुलिसकर्मी पांच टीमों में तैनात
- महाशिवरात्रि पर महाकाल दर्शन के लिए डिजिटल कंट्रोल रूम, गूगल मैप से तय होगा आपका रास्ता: जाम लगते ही मैप से गायब होगा रूट, खाली पार्किंग की ओर मोड़ दिया जाएगा ट्रैफिक
- महाकाल मंदिर में अलसुबह भस्मारती की परंपरा, वीरभद्र के स्वस्तिवाचन के बाद खुले चांदी के पट; पंचामृत अभिषेक और राजा स्वरूप में हुआ दिव्य श्रृंगार
उज्जैन: गुरुपूर्णिमा पर श्रीकृष्ण-बलराम की शिक्षा स्थली में विशेष पूजा, विद्या आरंभ संस्कार के लिए सांदीपनि आश्रम में उमड़े भक्त!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
उज्जैन के प्राचीन सांदीपनि आश्रम में इस बार गुरुपूर्णिमा महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह होते ही मंगलनाथ मार्ग स्थित इस दिव्य आश्रम में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण और गुरु सांदीपनि मुनि के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लग गईं।
गुरुपूर्णिमा के इस पावन अवसर पर मंदिर के पुजारी ने गंगा, गोमती और प्रयागराज से लाए गए पवित्र जल से भगवान श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि मुनि का अभिषेक किया। इसके बाद भगवान को नए रेशमी वस्त्र पहनाए गए और मोगरे के सुगंधित फूलों से उनका भव्य श्रृंगार किया गया। पूरा परिसर घंटियों और शंखनाद की मधुर ध्वनि से गुंजायमान हो उठा।
विशेष बात यह रही कि कई माता-पिता अपने नन्हे बच्चों को विद्या आरंभ संस्कार के लिए यहां लाए। उन्होंने गुरु सांदीपनि की परंपरा से अपने बच्चों को पहला अक्षर लिखवाया। मान्यता है कि जो बालक यहां विद्या आरंभ करता है, वह अत्यंत मेधावी बनता है और उसके जीवन में विद्या कभी क्षीण नहीं होती। सांदीपनि वंशज पुजारी पंडित राहुल व्यास ने बताया कि यह परंपरा बीते पांच हजार वर्षों से निर्बाध चली आ रही है।
बता दें, यह वही पुण्य धरा है जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ शिक्षा ग्रहण करने आए थे। कहा जाता है कि गुरु सांदीपनि ने पाटी पूजन करवा कर उनका विद्या आरंभ संस्कार करवाया था। श्रीकृष्ण ने सबसे पहले “श्री गणेशाय नमः”, “श्री सरस्वत्यै नमः” और “श्री गुरवे नमः” लिखकर अपने ज्ञानार्जन की शुरुआत की थी। उसी परंपरा को आज भी श्रद्धापूर्वक निभाया जाता है।