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बेटे के निधन के बाद बहू को बेटी मानकर बसाया नया घर: उज्जैन के परिवार ने किया कन्यादान, पुनर्विवाह पर करीब 7 लाख रुपए किए खर्च
मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले से एक ऐसी मानवीय और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने रिश्तों की परिभाषा को एक नई पहचान दी है। यहां एक परिवार ने अपने बेटे की असमय मृत्यु के बाद अपनी विधवा बहू को जीवनभर अकेले रहने के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि उसे अपनी बेटी का दर्जा देकर पूरे सम्मान और सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ उसका पुनर्विवाह कराया। इस पहल की हर ओर सराहना हो रही है।
उज्जैन के जेथल क्षेत्र में रहने वाले दिनेश बैरागी के छोटे बेटे कपिल बैरागी का विवाह वर्ष 2018 में विदिशा निवासी प्रियंका के साथ हुआ था। दोनों का वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से चल रहा था, लेकिन कुछ वर्षों बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। कपिल के पैर में कैंसर की गंभीर बीमारी का पता चला, जिसके बाद उनका लंबे समय तक इलाज चला।
करीब दो वर्षों तक परिवार ने हर संभव प्रयास किया ताकि कपिल स्वस्थ हो सकें। इलाज के दौरान परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन बीमारी लगातार बढ़ती गई। आखिरकार 6 जून 2023 को कपिल ने दुनिया को अलविदा कह दिया। बेटे की मौत से पूरा परिवार गहरे सदमे में आ गया और प्रियंका का जीवन भी अचानक बदल गया।

पति के निधन के बाद प्रियंका अपने ससुराल में ही रहने लगी। इस कठिन दौर में ससुर दिनेश बैरागी और सास कैलाश बाई ने उसे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने बहू को परिवार का अभिन्न सदस्य मानते हुए उसके भविष्य को लेकर गंभीरता से विचार किया। परिवार का मानना था कि प्रियंका की उम्र अभी लंबी है और उसे दोबारा खुशहाल जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए।
काफी विचार-विमर्श और दोनों परिवारों की सहमति के बाद प्रियंका के पुनर्विवाह का निर्णय लिया गया। इसके लिए विदिशा निवासी गोविंद के साथ रिश्ता तय किया गया। सभी आवश्यक सामाजिक और पारिवारिक सहमति मिलने के बाद विवाह की तैयारियां शुरू कर दी गईं।
विवाह समारोह भोपाल के एक रिसॉर्ट में आयोजित किया गया, जहां पूरे पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक विधि-विधान के साथ दोनों का विवाह संपन्न कराया गया। कार्यक्रम में दोनों परिवारों के रिश्तेदार, समाज के लोग और करीबी परिचित बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूरे आयोजन का माहौल भावुक होने के साथ-साथ खुशियों से भी भरा रहा।
शादी का सबसे भावुक पल तब आया जब दिनेश बैरागी ने अपनी बहू नहीं, बल्कि बेटी मानकर उसका कन्यादान किया। उन्होंने पिता का फर्ज निभाते हुए विवाह की हर रस्म में सक्रिय भागीदारी की। इस दृश्य को देखकर समारोह में मौजूद कई लोगों की आंखें नम हो गईं।

परिवार ने इस विवाह समारोह पर करीब 7 लाख रुपए खर्च किए। लगभग 400 मेहमानों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई। इसके अलावा नवदंपती को गृहस्थी शुरू करने के लिए आवश्यक घरेलू सामान भी उपहार स्वरूप दिया गया, ताकि उनका नया जीवन किसी तरह की परेशानी के बिना शुरू हो सके।
परिवार के सदस्य दीपक बैरागी ने बताया कि छोटे भाई के निधन के बाद ही यह निर्णय लिया गया था कि प्रियंका का जीवन दोबारा बसाया जाएगा। उनका कहना है कि परिवार ने बहू को कभी बोझ नहीं माना, बल्कि हमेशा बेटी की तरह सम्मान और अपनापन दिया।
दिनेश बैरागी ने कहा कि उन्होंने अपने बेटे को खोने का दुख जरूर सहा, लेकिन बहू का भविष्य अंधकार में नहीं जाने देना चाहते थे। उनका कहना है कि जब प्रियंका इस घर में आई थी तो वह बहू बनकर आई थी, लेकिन विदा बेटी बनकर हुई। यही सोच इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी प्रेरणा बनी।
प्रियंका के मायके पक्ष ने भी इस पहल की खुलकर सराहना की। उनके पिता ने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि बेटी को ससुराल में इतना सम्मान और अपनापन मिलेगा। उनके अनुसार जिस तरह समधी ने पिता की जिम्मेदारी निभाते हुए कन्यादान किया, वह समाज के लिए एक सकारात्मक और प्रेरणादायक संदेश है।
यह घटना केवल एक पुनर्विवाह की कहानी नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव का उदाहरण भी है। परिवार ने यह संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी रिश्तों को सम्मान, संवेदनशीलता और विश्वास के साथ निभाया जा सकता है। विधवा पुनर्विवाह को लेकर समाज में सकारात्मक सोच विकसित करने की दिशा में यह पहल एक मिसाल बनकर सामने आई है।