- बसंत पंचमी पर वासंती रंग में रंगेगा महाकाल मंदिर, भस्म आरती से होगी शुरुआत; सांदीपनि आश्रम में भी होंगे विशेष धार्मिक आयोजन!
- वीरभद्र जी के कान में स्वस्ति वाचन के बाद ली गई आज्ञा, पंचामृत अभिषेक और भस्म अर्पण के साथ साकार रूप में भगवान ने दिए दर्शन
- महाकाल दरबार पहुंचे सुनील शेट्टी, परिवार के साथ शांत माहौल में किए दर्शन; Border-2 की सफलता के लिए मांगा आशीर्वाद
- सभा मंडप से गर्भगृह तक अनुष्ठानों की श्रृंखला, भस्म अर्पण के बाद साकार रूप में हुए महाकाल के दर्शन; जल और पंचामृत से अभिषेक, रजत मुकुट और शेषनाग श्रृंगार के साथ खुले मंदिर के पट
- महाकाल की भस्म आरती में शामिल हुए अभिनेता मेका श्रीकांत, नंदी हॉल में बैठकर किया जाप
नई पालकी की जगह पुरानी पालकी में निकली श्रावण की दूसरी सवारी: 200 किलो की नई पालकी है ज्यादा वजनी, कहारों ने जताई आपत्ति!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रावण मास की दूसरी पारंपरिक सवारी इस बार फिर पुरानी पालकी में निकाली गई। इससे पहले 14 जुलाई को जब पहली सवारी नई पालकी में निकाली गई थी, तब कहारों ने उसके अधिक वजन और असंतुलन को लेकर आपत्ति जताई थी। मंदिर समिति ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए निर्णय लिया कि आगामी सभी सवारियां पुरानी पालकी में ही संपन्न होंगी।
मंदिर समिति के उप प्रशासक एस. एन. सोनी के अनुसार, नई पालकी का वजन साज-सज्जा और हैलोजन लाइट के साथ लगभग 200 किलोग्राम तक पहुंच जाता है, जबकि पारंपरिक पुरानी पालकी सजावट सहित लगभग 180 किलो तक सीमित रहती है। नई पालकी के अधिक वज़न के कारण उसे उठाने में कहारों को परेशानी हो रही थी, साथ ही सवारी के दौरान पालकी के डोलने की समस्या भी देखी गई, जो सवारी की गरिमा और संतुलन के लिहाज से चिंताजनक थी।
गौरतलब है कि नई पालकी पिछले वर्ष नवंबर में उत्तर प्रदेश के एक भक्त द्वारा गुप्त दान के रूप में भेंट की गई थी। इसे सागौन की लकड़ी और स्टील के पाइप से निर्मित किया गया है, जिस पर लगभग 20 किलो 600 ग्राम चांदी की परत चढ़ाई गई है। इसकी लंबाई पाँच फीट और चौड़ाई तीन फीट है, जो सामान्य पालकी की तुलना में थोड़ी भारी और विस्तृत बनती है।
मंदिर प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से पुरानी पालकी की जांच कर उसे मरम्मत और आवश्यक सुधार के बाद सवारी के लिए उपयुक्त बनाया है। अब श्रावण-भादों मास की सभी पारंपरिक सवारियां इसी परंपरागत पालकी में निकाली जाएंगी, ताकि शास्वत परंपरा और श्रद्धालुओं की आस्था में कोई व्यवधान न आए।