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साल में सिर्फ एक बार खुलते हैं भगवान श्री नागचंद्रेश्वर के पट, दर्शनार्थियों का उमड़ा सैलाब; इस बार 7 लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
उज्जैन नगरी में नागपंचमी का पर्व एक आध्यात्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था की उस परंपरा का प्रतीक है, जो सहस्रों वर्षों से अनवरत बह रही है। वर्ष में केवल एक बार खुलने वाले श्री महाकालेश्वर मंदिर के द्वितीय तल स्थित भगवान श्री नागचंद्रेश्वर के पट 28 जुलाई की रात ठीक 12 बजे श्रद्धाभाव के साथ खोले गए। जैसे ही पट खुले, संपूर्ण मंदिर परिसर मंत्रोच्चार और घंटानाद से गूंज उठा, और भक्तों की आंखों में वर्षों से पल रही आस्था छलक पड़ी।
पट खुलते ही सर्वप्रथम श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के महंत विनीतगिरी महाराज द्वारा विधिवत पूजन और अभिषेक संपन्न किया गया। इस पावन अवसर पर प्रदेश के प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री सम्पतिया उइके, और विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा सहित कई गणमान्यजन उपस्थित रहे। पूजन के उपरांत भगवान नागचंद्रेश्वर के शिवलिंग का अभिषेक कर मंदिर को आम श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिया गया।
श्रद्धा का यह आलम था कि भक्तगण तो 28 जुलाई की रात से ही कतारों में लगकर पट खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। नागों के देवता श्री नागचंद्रेश्वर के एक झलक पाने के लिए लाखों श्रद्धालु घंटों खड़े रहकर भी आनंद और श्रद्धा से सराबोर दिखे। 7 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन लाभ प्राप्त कर लिया था, यह जानकारी श्री महाकालेश्वर मंदिर समिति की पीआरओ गौरी जोशी ने साझा की।
इस पावन पर्व पर महाकाल मंदिर में एक और विशिष्ट परंपरा भी पूरी श्रद्धा से निभाई गई। कोटितीर्थ कुंड पर श्री शेषनाग की विशेष पूजा के पश्चात श्री महाकालेश्वर भगवान को भस्मार्ती के दौरान रजत शेषनाग धारण करवाए गए। यह दृश्य स्वयं में अद्वितीय था — जब संपूर्ण परिसर में रजत नाग की आभा और धूप की सुगंध से वातावरण शिवमय हो गया।
नागपंचमी के दिन दोपहर 12 बजे पुनः श्री नागचंद्रेश्वर भगवान की पूजा महानिर्वाणी अखाड़े के महंत द्वारा की गई, जिसके उपरांत महाकाल मंदिर के शिखर पर ध्वज पूजन कर नवीन ध्वज स्थापित किया गया। यह ध्वज परिवर्तन न केवल धार्मिक परंपरा है, बल्कि एक आध्यात्मिक संदेश भी — कि महाकाल की सत्ता चिरंतन है और उनका संरक्षण हर युग में अटल रहेगा।
सायं आरती के समय भी मंदिर परिसर पूरी तरह भक्तिभाव से सराबोर था। पुजारीगणों द्वारा श्री नागचंद्रेश्वर की आरती और पूजन करते समय भी दर्शन व्यवस्था सतत चालू रही, जिससे हजारों श्रद्धालुओं को एक पल के लिए भी महादेव के दिव्य स्वरूप से वंचित न रहना पड़े।