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उज्जैन में धूमधाम से निकलेगी डोल ग्यारस की झांकियां: कालभैरव की सवारी बनेगी आकर्षण का केंद्र, जेल में भी होंगे भगवान के दर्शन!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी का पर्व, जिसे उज्जैन में जलझूलनी एकादशी या डोल ग्यारस कहा जाता है, इस बार बुधवार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। आस्था, परंपरा और उत्सव का संगम इस दिन उज्जैन की गलियों और मंदिरों में दिखाई देगा। मान्यता है कि इसी तिथि पर भगवान विष्णु योगनिद्रा में करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तनी एकादशी भी कहा जाता है।
बुधवार शाम 6 बजे से शहर में डोल ग्यारस की झांकियां और अखाड़े निकलना शुरू होंगे, जो मध्यरात्रि तक अंकपात पहुंचेंगे। इस वर्ष रास मंडल और विभिन्न झांकियां शाम 6:30 बजे तीन बत्ती चौराहा स्थित संत बालीनाथ जी की प्रतिमा पर एकत्र होकर चल समारोह के रूप में आगे बढ़ेंगी। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पुलिस-प्रशासन ने रूट पर बैरिकेडिंग की व्यवस्था भी की है।
जुलूस में अखाड़ों की पारंपरिक कलाएं, रास मंडल और समाज की झांकियां शामिल होंगी। बैरवा समाज का विशाल जुलूस भी इसमें भाग लेगा, जो शहर के अलग-अलग क्षेत्रों से होते हुए तीन बत्ती चौराहा पर एकत्र होगा।
यह रहेगा जुलूस का मार्ग
जुलूस रात 8 बजे तीन बत्ती से शुरू होकर टॉवर चौक, ग्रांड होटल, फीगंज ओवरब्रिज, चामुंडा माता मंदिर, देवास गेट, मालीपुरा, दौलतगंज, फव्वारा चौक, नई सड़क, कंठाल, सतीगेट, सराफा, छत्री चौक, गोपाल मंदिर, कमरी मार्ग, टंकी चौक, सब्जी मंडी, भार्गव तिराहा, खजूर वाली मस्जिद, अब्दालपुरा, जीवाजीगंज, लालबाई-फूलबाई होते हुए अंकपात चौराहा पहुंचेगा और अगले दिन सोलह सागर पर सम्पन्न होगा।
यातायात व्यवस्था में बदलाव
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए बुधवार शाम 5 बजे से यातायात व्यवस्था बदली जाएगी। तीन बत्ती, देवास गेट और चामुंडा चौराहा जैसे प्रमुख मार्गों पर डायवर्शन रहेगा। भारी वाहनों का प्रवेश इस दौरान प्रतिबंधित किया जाएगा। प्रशासन ने यात्रियों को वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करने की सलाह दी है।
इसी दिन शाम 4 बजे भैरवगढ़ स्थित कालभैरव मंदिर से भगवान कालभैरव की पारंपरिक सवारी निकलेगी। भगवान को चांदी की पालकी में विराजित कर यात्रा निकाली जाएगी। परंपरा के अनुसार पहले पूजन-आरती होगी और सिंधिया स्टेट की पगड़ी भगवान को पहनाई जाएगी। पालकी निकलते समय सशस्त्र पुलिस जवान सलामी देंगे।
सवारी जेल चौराहा, नाका चौराहा, माणक चौक, सिद्धवट मंदिर और बृजपुरा से होकर गुजरेगी। भैरवगढ़ जेल के सामने विशेष कार्यक्रम होगा, जहां कैदियों को भी भगवान कालभैरव के दर्शन कराए जाएंगे। अंत में यह सवारी शिप्रा तट स्थित सिद्धनाथ मंदिर पहुंचेगी और फिर कालभैरव मंदिर लौटेगी।
डोल ग्यारस का पर्व सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जल-पूजन किया था। तभी से इस दिन भगवान की प्रतिमा को पालकी में बैठाकर नगर भ्रमण और तालाब किनारे जल में झूलन कराने की परंपरा शुरू हुई, इसलिए इसे जलझूलनी एकादशी कहा जाता है।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन की गई पूजा-अर्चना और नगर भ्रमण में सहभागिता से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु का आशीर्वाद बना रहता है।