- संत रविदास जयंती पर उज्जैन में एक साथ जुटे संत और समाज, 2121 दीपकों की रोशनी में जगमगाया शिप्रा तट
- महाकाल मंदिर पहुंचीं महिला कांग्रेस अध्यक्ष अल्का लांबा, मीडिया से बोलीं महिला कांग्रेस अध्यक्ष— नाम में भगवान जोड़ना काफी नहीं, सवाल ये है कि काम क्या किया जा रहा है
- उज्जैन में शिप्रा आरती को मिलेगा नया स्वरूप, रामघाट को वैश्विक पहचान देने की तैयारी; रोज होने वाली शिप्रा आरती बनेगी धार्मिक पर्यटन का केंद्र
- सुबह की पहली घंटी के साथ खुले महाकाल के पट, भस्म आरती में दिखा राजा स्वरूप
- महाकाल दरबार में भस्म आरती की अलौकिक छटा: सभा मंडप से गर्भगृह तक विधिविधान के साथ संपन्न हुई आराधना, बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने किए दर्शन
चौबीस खंभा माता मंदिर की अनोखी परंपरा: नवरात्रि में मदिरा का भोग, 27 किमी तक बहाई जाती शराब की धार और होती है नगर पूजा
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है और यहाँ के मंदिरों की महिमा हर किसी को आकर्षित करती है। इन्हीं प्राचीन और चमत्कारिक स्थलों में से एक है चौबीस खंभा माता मंदिर, जो नवरात्रि में श्रद्धालुओं का विशेष केंद्र बनता है। 9वीं–10वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर सिर्फ स्थापत्य कला का नमूना नहीं है, बल्कि अनोखी परंपराओं और आस्था का प्रतीक भी है।
कहा जाता है कि उज्जैन के महान सम्राट राजा विक्रमादित्य ने इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। बाद में परमार वंश के राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार कराया। मंदिर में बने 24 भव्य नक्काशीदार खंभे इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं। इन पर उकेरे गए देवताओं की आकृतियाँ, पौराणिक दृश्य और पुष्प सज्जा उस दौर की उत्कृष्ट गुप्त स्थापत्य शैली को दर्शाती हैं।
मंदिर में महामाया और महालया माता विराजित हैं। मान्यता है कि ये देवियाँ नगर और भक्तों को अनिष्ट से बचाती हैं। प्राचीन काल में यह मंदिर महाकाल वन का मुख्य प्रवेश द्वार भी माना जाता था। सिंह की मूर्तियों से सुसज्जित द्वार उस समय की शक्ति और पराक्रम का प्रतीक है।
नगर पूजा और मदिरा भोग की परंपरा
चौबीस खंभा माता मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा है नवरात्रि की महाअष्टमी पर होने वाली नगर पूजा। इस दिन माता को मदिरा का भोग लगाया जाता है। खास बात यह है कि जिला प्रशासन खुद इस पूजा के लिए 30 बोतल शराब नि:शुल्क उपलब्ध कराता है।
शराब माता को चढ़ाने के बाद बूंद-बूंद करके पूरे शहर के लगभग 40 मंदिरों तक (करीब 27 किमी क्षेत्र) में गिराई जाती है। साथ ही माता को बल बाकल, पूड़ी-भजिये और सोलह श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है। इस परंपरा की शुरुआत राजा विक्रमादित्य के समय से हुई थी, जिसका उद्देश्य महामारी और आपदा से नगर की रक्षा और समृद्धि की कामना करना है।
पूजा की तैयारियाँ दो दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। अष्टमी की सुबह ढोल-नगाड़ों के साथ पूजा-अर्चना होती है और पूरे शहर में देवी-भैरव मंदिरों में विशेष अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।
इस मंदिर से जुड़ी एक और अद्भुत परंपरा है बीमारियों का झाड़ा जाना। यहाँ के पुजारी श्रद्धालुओं की आँखें और साँस देखकर बताते हैं कि पीड़ित को पीलिया है या मोतीझरा (टाइफाइड)। इसके बाद वे विशेष जड़ी-बूटी की दवा देते हैं, जिसके बारे में दावा है कि पाँच दिन में रोग ठीक हो जाता है।
दवा के साथ नियम भी सख्त होते हैं — पाँच दिन तक दूध, केला और पोहा नहीं खाना होता और स्नान से भी परहेज करना पड़ता है। वहीं नजर उतारने के लिए यहाँ नीबू और झारनी की परंपरा है। इसी वजह से दूर-दूर से लोग यहाँ उपचार के लिए आते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महामाया और महालया माता हर शासक की परीक्षा लेती थीं। केवल वही राजा महाकाल वन में प्रवेश कर पाता था, जो धर्म, सत्य और न्याय का पालन करता हो। स्वयं राजा विक्रमादित्य ने भी इन देवियों की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और तभी उन्हें आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।
आज यह मंदिर जयसिंहपुरा के गुदरी चौराहे पर स्थित है और महाकालेश्वर मंदिर के पास होने के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। मंदिर का वातावरण सुबह और शाम की आरती में विशेष रूप से भक्तिमय हो उठता है।