- उज्जैन में भस्म आरती में शामिल हुए बिहार के पूर्व डिप्टी CM विजय सिन्हा: नंदी हॉल में बैठकर किए दर्शन, महाकाल से मांगा आशीर्वाद
- महाकाल मंदिर में भस्म आरती: त्रिपुण्ड, त्रिशूल और डमरू से सजे बाबा, गूंजी ‘जय श्री महाकाल’
- उज्जैन में तपिश का प्रकोप: 40-41°C पर अटका पारा, अगले 4 दिन में और बढ़ेगी गर्मी; स्वास्थ्य विभाग सतर्क, हीट मरीजों के लिए विशेष वार्ड तैयार
- सिंहस्थ 2028 की तैयारियों पर सख्ती: मुख्य सचिव ने कहा—समय से पहले पूरे हों काम, बारिश से पहले बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करें; मेडिसिटी, सड़क और पुल निर्माण की भी समीक्षा की
- महाकाल मंदिर में तड़के भस्म आरती: पंचामृत अभिषेक के बाद रजत चंद्र-त्रिशूल से सजा बाबा का दिव्य रूप, गूंजे जयकारे
श्राद्धपक्ष में व्यवसायी ने रामघाट पर कर दिया स्वयं का पिंडदान
उज्जैन। गोवा में माइंस का बिजनेस करने वाले एक व्यवसायी ने पत्नी व परिवार से दुखी होकर श्राद्ध पक्ष में रामघाट पहुंचकर स्वयं का पिण्डदान किया। चर्चा में व्यवसायी ने कहा कि अब भगवान जिस मार्ग पर ले जाएंगे चला जाऊंगा। कर्मकाण्ड कराने वाले पं. आनंद गुरु ने उक्त व्यवसायी को नया नाम दिया मंगल और आगे से वह इसी नाम से पहचाने जाएंगे।
सामान्य तौर पर कोई व्यक्ति साधु संन्यासी बनता है तो उसके पहले घर, परिवार, समाज सभ कुछ त्यागकर मोह माया के बंधनों से मुक्त होता है। साधुओं की जमात में शामिल होने से पहले एक प्रक्रिया स्वयं के पिण्डदान की भी होती है। आज सुबह रामघाट पर देवराज विश्वकर्मा पिता रामलखन निवासी रीवा पहुंचे और यहां पं. आनंद गुरु से स्वयं का पिण्डदान करने की बात कही।पं. आनंद गुरु ने विधि विधान से न सिर्फ देवराज विश्वकर्मा का पिण्डान उन्हीं के हाथों कराया बल्कि उन्हें नया नाम भी दिया मंगल। देवराज आज के बाद से मंगल के नाम से पहचाने जाएंगे।
देवराज से जब स्वयं का पिण्डदान करने का कारण पूछा गया तो अनेक चौंकाने वाली जानकारी दी। देवराज बताते हैं कि वह रीवा के रहने वाले हैं लेकिन गोवा में माइंस का बिजनेस करते थे, परिवार में पत्नी, माता, पिता, भाई बहन सब हैं। शादी के बाद से ही पत्नी व परिवार से मन दुखी रहने लगा। व्यापार से कोई मोह नहीं रहा और पिछले दिनों ही संसार के मोह माया के बंधनों को त्यागने का मन बना। परिवार को इससे अवगत कराने के बाद वह उज्जैन आये और स्वयं का पिण्डदान कर दिया।
न साधु न संन्यासी, आगे भगवान मालिक
घर परिवार, व्यापार सबकुछ त्यागने के बाद आज देवराज विश्वकर्मा का नवजीवन हुआ और उन्हें नाम मिला मंगल। देवराज ने बताया कि अभी उन्होंने साधु, संन्यासी बनने का मन तो नहीं बनाया है लेकिन आगे भगवान मालिक हैं उनके द्वारा जो मार्ग दिखाया जायेगा वहीं निकल जाएंगे।