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तेजा दशमी पर उमड़ा आस्था का सैलाब, उज्जैन से लेकर गांव-गांव तक भक्तों का तांता; भक्तों ने चढ़ाई रंग-बिरंगी छतरियां!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी को लोकदेवता वीर तेजाजी महाराज की जयंती के रूप में तेजा दशमी मनाई जाती है। उज्जैन सहित पूरे मालवा और राजस्थान क्षेत्र में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सुबह से ही तेजाजी के मंदिरों में भक्तों की लंबी कतारें लग गईं।
मंदिरों में गूंजे ढोल-ढमाके और भक्ति गीत
शहर और ग्रामीण क्षेत्रों के मंदिरों में श्रद्धालु ढोल-ढमाकों के साथ पहुंच रहे हैं। भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति होने पर रंग-बिरंगी छतरियाँ और निशान अर्पित कर रहे हैं। उज्जैन के दमदमा क्षेत्र स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर, नीलगंगा रोड पर श्री चैतन्य वीर तेजाजी मंदिर और बुधवारिया स्थित तेजाजी मंदिर में विशेष भीड़ देखी गई। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों के मोहनपुरा, पंवासा और भेरूगढ़ में भी भक्तों का तांता लगा हुआ है।
घरों में नहीं काटी जाती सब्जी
तेजा दशमी के दिन एक विशेष परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन घरों में सब्जी नहीं काटी जाती। भक्तजन दाल, बाटी और चूरमा का भोग लगाकर तेजाजी महाराज की पूजा-अर्चना करते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित सीताराम शर्मा के अनुसार, भक्त विशेष रूप से बीमारी से मुक्ति और संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगते हैं।
नाग मंदिर में विशेष आयोजन
महाकाल वाणिज्य क्षेत्र स्थित प्राचीन नाग मंदिर भी आज भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। पंडित दीपेश प्रदीप व्यास बताते हैं कि करीब ढाई सौ साल पुराने इस मंदिर में नाग देवता की प्राचीन मूर्ति और बावड़ी आज भी उसी भव्यता से विराजमान है। मान्यता है कि यह मंदिर महाकाल मंदिर जितना ही शक्तिशाली और दिव्य है, इसलिए यहाँ के नाग देवता को महाकाल मंदिर का ‘राजा’ कहा जाता है।
तेजा दशमी पर यहाँ विशेष मेला भरता है। भक्त दूध, नारियल और पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामनाएँ व्यक्त करते हैं और पूर्ण होने पर छत्री चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं।
निकलेगा निशान चल समारोह
नागचंद्रेश्वर मंदिर से दोपहर में निशान चल समारोह निकाला जाएगा। भक्त मंडल के प्रचार सचिव सुरेश रायकवार ने बताया कि यह शोभायात्रा दमदमा क्षेत्र के विभिन्न मार्गों से होते हुए पुनः मंदिर प्रांगण पहुँचेगी। इसके बाद मंदिर में भजन संध्या का आयोजन होगा और देर शाम महाआरती के बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया जाएगा।
लोककथा से जुड़ी आस्था
लोककथाओं के अनुसार, वीर तेजाजी महाराज ने गायों की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था। वचन निभाने के लिए उन्होंने साँप से डसवाना स्वीकार किया और उसी क्षण वे नागों के देवता बन गए। तभी से उनकी पूजा हर साँपदंश के निवारण और लोककल्याण के लिए की जाती है।
तेजा दशमी पर मंदिरों का वातावरण आस्था और भक्ति से सराबोर रहता है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि यहाँ आकर लोकदेवता तेजाजी महाराज उनकी मनोकामनाएँ अवश्य पूरी करते हैं। यही कारण है कि यह पर्व सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि लोक आस्था और परंपरा का भी प्रतीक बन गया है।