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48/84 श्री अभयेश्वर महादेव
48/84 श्री अभयेश्वर महादेव
एक बार कल्प समाप्त होने पर चंद्र ओर सूर्य भी नष्ट होगे। इस पर ब्रम्हा को चिंता हुई कि अब सृष्टि की स्थापना केसे होगी, इस दुख के कारण आंसू गिरे जिससे हारव ओर कालकेलि नामक दो दैत्य प्रकट हुए। सृष्टि पर कुछ न होने के कारण दोनो दैत्य ब्रम्हा को मारने के लिए दौड़े। ब्रम्हा वहां से भागे। उन्होने समुद्र के बीच प्रकाश देखा ओर पुरूष से उसका परिचय पूछा तो उन्होने बताया कि सृष्टि पालक विष्णु हॅु। ब्रम्हा ने उनसे दोनो दैत्यों से रक्षा करने के लिए कहा। दैत्य विष्णु को भी मारने के लिए दौड़े। ब्रम्हा ओर विष्णु दोनो समुद्र में छिप गए। यहाॅ ब्रम्हा ने महाकाल वन में नूपुरेश्वर के दक्षिण में स्थापित शिवलिंग का पूजन करने के लिए कहा। ब्रम्हा ओर विष्णु दोनो महाकाल वन पहुंचे ओर शिवलिंग का पूजन किया। शिव ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए। शिव ने भय का कारण पूछा तो ब्रम्हा ने बता दिया। शिव ने दोनो को पेट में छिपा लिया ओर कुछ देर बाद जब दोनो बाहर निकले तो दोनो दैत्य भस्म हो चुके थे। ब्रम्हा ओर विष्णु ने शिव से वरदान मांगा कि जो भी मनुष्य शिवलिंग के दर्शन करेगा उसे आप अभयदान देगे। तब से ही शिवलिंग अभयेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ। मान्यता है कि जो भी मनुष्य शिवलिंग का दर्शन कर पूजन करता है उसे धन, पुत्र ओर स्त्री का वियोग नही होता है। संसार के समस्त सुखों को भोग कर अंतकाल में परमगति को प्राप्त करता है।