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अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी:घर बनाने की षोडश कक्ष विन्यास विधि यह सुख और स्वास्थ्य के लिए अनुकूल
घर बनाने के प्राचीन वास्तु विज्ञान को आज के आधुनिक घर बनाने में किस तरह उपयोग किया जा सकता है, इसका एक मॉडल शहर के दो इंजीनियर्स ने तैयार किया है। यह मॉडल विक्रम कीर्ति मंदिर में आयोजित वास्तु शास्त्रीय नगर नियोजन एवं राजाभोज विषय पर आधारित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रदर्शित किया गया है।
इंजीनियर्स हरिराम सोलंकी व मयंक राजावत के अनुसार प्राचीन समय में भूखंड का आकार और उस पर बनने वाले घर का नक्शा वास्तु शास्त्र के अनुसार तय होता था लेकिन आज शहरों में न तो वास्तु शास्त्र के अनुसार भूखंड उपलब्ध होते हैं और न मापदंडों का पालन हो पाता है। वास्तु शास्त्र की षोडश कक्ष विधि सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इससे उपलब्ध भूखंड पर कैसे वास्तु का पालन कर घर का निर्माण कर सकते हैं, जो सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हो।
महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय व विक्रम विवि के संयुक्त तत्वावधान में वास्तु शास्त्रीय नगर नियोजन एवं राजा भोज पर आधारित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का शुभारंभ सोमवार सुबह हुआ। उद्घाटन सत्र में विक्रम विवि के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा राजा भोज और भारतीय विद्या एक महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
अध्यक्षता संस्कृत विवि के कुलपति प्रो. विजयकुमार सीजी ने की। काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनयकुमार पांडेय ने संबोधित किया। संचालन डॉ. विजय शर्मा ने किया। आभार डॉ. उपेंद्र भार्गव ने माना। प्रथम दिन दो सत्र हुए। इसमें 8 प्रतिभागियों सहित 6 विद्वानों के वक्तव्य हुए। मंगलवार को अलग-अलग विषयों पर आधारित चार सत्र होंगे।
राजाभोज ने समरांगण सूत्रधार ग्रंथ में बताया कैसा घर बनाएं
पुराविद् एवं अश्विनी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. आरसी ठाकुर ने संगोष्ठी स्थल पर राजाभोज लिखित ग्रंथ समरांगण सूत्रधार पर आधारित घर बनाने की विधियों की प्रदर्शनी लगाई है। डॉ. ठाकुर का कहना है पहली बार राजाभोज के ग्रंथ आैर शोध आधारित भोजकालीन स्थापत्य प्रदर्शनी लगाई है।
विक्रमादित्य शोधपीठ के निदेशक श्रीराम तिवारी कहते हैं कि प्रदर्शनी में दिए गए प्रामाणिक तथ्य और रेखांकन जनमानस के लिए उपयोगी हैं। समरांगण सूत्रधार के श्लोकों के भावार्थ के साथ प्रदर्शनी में घरों के प्रकार व उनके निर्माण की विधि, दिशानुसार घर, परमशायी पदवास्तु, दिशाओं के द्वार स्थान, चारों वर्णों के नागरिकों के लिए घर की लंबाई-चौड़ाई का अनुपात, द्वार के प्रकार आदि शामिल हैं।