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दशहरा 2025 से पहले सियासी-सामाजिक संग्राम: ब्राह्मण समाज ने कहा—“रावण को सजा मिल चुकी, बार-बार जलाना परंपरा नहीं, अपमान है”; ब्राह्मण समाज अब हाईकोर्ट जाने की तैयारी में!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
इंदौर के चर्चित राजा रघुवंशी मर्डर केस की आरोपी सोनम रघुवंशी को लेकर हाल ही में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया था। कोर्ट ने सोनम और अन्य महिलाओं के नाम पर बनाए गए “शूर्पणखा पुतला दहन” कार्यक्रम पर रोक लगा दी थी। अब इसी फैसले का हवाला देते हुए अखिल भारतीय युवा ब्राह्मण समाज ने दशहरे पर होने वाले रावण दहन को भी चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है।
ब्राह्मण समाज का तर्क: “रावण दहन से होता है अपमान”
संगठन के महामंत्री रूपेश मेहता का कहना है कि रावण को त्रेता युग में ही उसकी सजा मिल चुकी है। हर साल उसका पुतला जलाना केवल ब्राह्मण समाज को बदनाम करने की परंपरा बन गई है। उन्होंने कहा –
“जब हाईकोर्ट ने सोनम रघुवंशी के नाम पर शूर्पणखा का पुतला जलाने से रोक लगाई, तो अब हमें भी न्याय मिलना चाहिए। रावण दहन दरअसल हमारे समाज का अपमान है।”
मेहता ने यह भी घोषणा की कि दशहरे से पहले संगठन काली मटकी फोड़कर विरोध दर्ज कराएगा और हाईकोर्ट में याचिका दायर करेगा।
विरोध की तैयारी और भगवान से प्रार्थना
रूपेश मेहता ने साफ कहा कि जहां-जहां भी रावण दहन के कार्यक्रम होंगे, वहां ब्राह्मण समाज आयोजकों के नाम पर काली मटकियां फोड़कर विरोध करेगा। साथ ही, भगवान से आयोजकों को “सद्बुद्धि देने की प्रार्थना” भी की जाएगी।
उज्जैन में लगे थे विरोध के पोस्टर
करीब 15 दिन पहले उज्जैन के कई इलाकों में रावण दहन के विरोध में पोस्टर लगाए गए थे। इसमें महाकाल सेना और ब्राह्मण समाज ने लोगों से अपील की थी कि वे इस तरह के आयोजनों से दूर रहें। महाकाल सेना के संरक्षक महेश पुजारी ने कहा था –
“रामायण में कहीं भी रावण दहन का उल्लेख नहीं है। यह परंपरा अब सिर्फ मनोरंजन और राजनीति का साधन बन चुकी है।”
याद दिला दें, कुछ दिन पहले इंदौर में एक संस्था पौरुष ने सोनम रघुवंशी समेत 11 महिलाओं का पुतला जलाने की तैयारी की थी। इसमें सोनम को “शूर्पणखा” के प्रतीक के तौर पर शामिल किया गया था। सोनम की मां संगीता रघुवंशी ने इस पर आपत्ति जताई और हाईकोर्ट में याचिका लगाई।
हाईकोर्ट ने सुनवाई में साफ कहा – “किसी भी व्यक्ति का पुतला जलाना उसकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाना है। यह लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।”
इसी आधार पर कार्यक्रम पर रोक लगा दी गई।
परंपरा या विवाद?
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या दशहरे पर रावण दहन की परंपरा भी इसी श्रेणी में आती है? ब्राह्मण समाज का मानना है कि रावण दहन समाज को बदनाम करने का जरिया बन गया है और इसे बंद होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, दशकों से चली आ रही यह परंपरा लाखों लोगों की आस्था और अच्छाई की जीत के प्रतीक से जुड़ी मानी जाती है।